एक शांत और पवित्र आश्रम में एक शिष्य अपनी साधना में लीन रहता था। वर्षों की तपस्या और शास्त्रों के अध्ययन के बाद, एक दिन उसे लगा कि उसने सब कुछ जान लिया है। उसके मन में अहंकार का एक सूक्ष्म बीज अंकुरित हो गया।
उत्साह से भरा हुआ वह शिष्य दौड़ता हुआ अपने गुरुदेव के पास पहुंचा। उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था। उसने गुरुदेव से कहा, "गुरुदेव! आज मैं बहुत प्रसन्न हूं। मुझे प्रतीत होता है कि मुझे सारा ज्ञान प्राप्त हो गया है। अब मैं पूर्ण ज्ञानी बन चुका हूं।"
गुरुदेव शांत भाव से बैठे थे। उन्होंने शिष्य की आंखों में तैरते हुए उस सूक्ष्म अहंकार को देख लिया। वे मंद-मंद मुस्कुराए और हाथ के इशारे से शिष्य को अपने पास बैठने का संकेत किया।
गुरुदेव ने स्नेहपूर्वक कहा, "वत्स! तुम्हारी उपलब्धि पर चर्चा करने से पहले, मैं तुम्हें एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूँ। ध्यान से सुनना।" शिष्य उत्सुकता से बैठ गया।
गुरुदेव ने कथा आरम्भ की:
"एक कथा है एक लड़का जो अनाथ था वह बचपन से ही एक धनी सेठ के घर में नौकरी करता था। सभी उसको "गया" कहकर बुलाते थे । वो बचपन से ही उस सेठ के घर, काम करता था अपनी जीविका के लिए कभी - कभार उसे थोड़े बहुत पैसे भी मिलजाते थे , उसने अपना पूरा बचपन सेठ के यहा गुजार दिया , जवानी भी मानो खत्म ही होराह था । एक दिन उसके मन ये प्रश्न उठा की कब तक मै यहा कोल्हू के बैल की तरह काम करता राहू ? आखिर इस जीवन का उदेश्य क्या है ? कुछ मिला तो नहीं इस जीवन से उसके मन मे तीव्र इच्छा जागी,स्वयं को जाननेकी।
एक दिन उसने हिम्मत करके अपने सेठ से बोल ही दिया की अब मुझे छुट्टी दीजिए मै इन भेड़ चाल से तंग आगया हु , मै स्वयं को खोजना चाहता हु , जानना चाहता हु , कृपया आप मुझे विदा दीजिए।
सेठ ने कहा ठीक है लेकिन तुम जाओगे कहा तुम बचपन से यही हो , न तुम्हें तुम्हारी माँ - बाप का पता है , न तुम्हें अपने घर का पता है तुम आखिर जाओगे कहा ? उस लड़के ने कहा पता नहीं , लेकिन मेरे मन मे एक विचार उठ रहा मै "गया" की ओर प्रस्थान करू । सेठ ने कहा ठीक है, जाओ लेकन मुझे आकर बताना, यदि तुम्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिलजाए , तो -उसे ने कहा - जरूर ।मै आपको लौटकर बताउगा ।
लेकिन वो कभी लौटा नहीं ,न मालिक को अपने होनेका कोई संदेश भेजा ।
सेठ के जो रिश्तेदार थे उन्हों ने सेठ से पूछा की महानुभाव आपके यह जो लड़का काम करता था , कही दिखाई नहीं देता , कहा गया वो ?
सेठ ने मुसकुराते हुवा कहा - "गया" नाम का लड़का था "गया" तो गया ही रह गया ।
होसकता है उसे अपना घर मिल गया, घर मिलजाने के बाद कौन लौटना चाहेगा , कौन है जो उस घर की खबर दे , जिसने अपना घर पालिया वो तो "मौन" होगया , चुप होगया , क्योंकि अपना घर मिलजाने के बाद कौन लौटकर पता बताने आए , जो घर खोजने गया था वही मिट गया ।अब बताने वाला कोई नहीं है।
"यदि नमक की गुड़िया सागर की गहराई नापने जाए तो वो लौटकर नहीं बता पाएगी की सागर कितना गहरा था "
क्यों कि ज्यों - ज्यों सागर की गहराई मे वो उतरता जाएगा ,वो मिटता जाएगा। कोई बताने वाला बचेगा नहीं कि सागर की गहराई कितनी थी ।
तुम अपने आस पास देखो !सभी लोग भाग रहे , पता नहीं कहा भाग रहे है ? किसी को अपने घर का कोई पता नहीं है फिर भी भाग रहे है ,पता नहीं क्या खोज रहे है ।
जिसने अपने घर को पा लिया ,वो लौटेगा नहीं क्योंकि उसका आलिंगन ही इतना सुखदायक है , उस विराट को पालेने के बाद क्षुद्र की चिंता कौन करता है ।
तो जो कहता है की "मै" जान गया असल मे अभी तक उसने कुछ भी नहीं जाना।
तो मित्रों सही ज्ञान मौन................है । हमे इस कहानी से यही सिख मिलता है ।
सच्चा ज्ञान वही है जहाँ 'मैं' मिटजाता । जब तक कोई कहने वाला है कि "मुझे ज्ञान हो गया",मै जान गया -- तब तक वह ज्ञान से कोसों दूर है। जिसने स्वयं को जानलिया वो जानने वाला "मै" ' उस परम में विलीन हो जाता है।
ये सुनकर शिष्य समझ गया कि उसका यह कहना मैं ज्ञानी हो गया हूँ । उसके अज्ञान का प्रमाण था।
और वो शिष्य गुरू के चरण मे गिर गया ।
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