<आज हम प्रकृति के एक छोटे से जीव, मकड़ी, से जीवन
का एक बड़ा पाठ सीखने का प्रयास करते हैं।>
क्या आपने कभी शांत होकर स्वयं से यह प्रश्न किया है कि—
- इस जीवन में इतना दुःख क्यों है?
- यह जीवन मकड़ी के जाले की तरह इतना उलझा हुआ क्यों है?
- यह जो जगत हमारे आसपास दिखाई दे रहा है—क्या वास्तव में यही इसकी अंतिम
वास्तविकता है?
जैसे मकड़ी अपने आसपास जाले बुनती है, वैसे ही हम ने भी अपने आसपास मान्यताओं,
धारणाओं और पूर्वाग्रहों के जाल बना रखे हैं। मकड़ी के पास इतनी बुद्धिमत्ता होती है कि
वह अपने ही बनाए हुए जाल में सुरक्षित रहती है, लेकिन हम
अपने ही बनाए हुए जाल से कभी बाहर नहीं निकल पाते। उसी जाल में फँसकर हमारा
संपूर्ण जीवन नष्ट हो जाता है।
क्योंकि हमारे चारों ओर अज्ञान का जाल
फैला हुआ है, और वह इतना सुखदायक
लगता है कि हम उसी में फँसकर पूरा जीवन खो देते हैं। यदि कोई हमें बताने भी आ जाए
कि यह जाल तुम्हारी जीवन- को चूस रहा है, तो हमें उन पर
क्रोध आ जाता है—"कि मैं तो गहरि नींद मे था अच्छा स्वप्न चल रहा था, यह कौन है जो मेरी नींद में खलल उत्पन्न कर रहा है।
यदि कोई हमें कहे कि यह जाल झूठा है, तो हमें विश्वास नहीं होता, क्योंकि हम इस झूठे जाल के आदि हो चुके हैं।
यह जाल बनना अपने आप में कोई बुरी बात
नहीं है, क्योंकि यह जीवन को
सुरक्षा देता है; "समस्या फसने मे है"। तो हमे इस जाल से निकलने का मार्ग खोजना चाहिए। और ऐसे जाल का निर्माण करना चाहिए जिसमें हम फँसें
नहीं।
मकड़ी के लिए जाल बनाना और बिगाड़ना एक 'खेल' मात्र
है। क्यों? क्योंकि वह इस जाल की मिथ्या को जानती है। वह जानती है कि यह जाल
उसी के भीतर से निकला है—वह जब चाहे उसे अपने भीतर समेट सकती है (खा सकती है), और जब चाहे वापस प्रकट कर सकती है। मकड़ी
को अपने रचे हुए जगत का ज्ञान है, इसलिए वह उससे नहीं
फँसती है ।
एक तरह से देखें तो मकड़ी मनुष्य से
अधिक बुद्धिमान है—वह उसी जाल से अपना
रक्षण भी करती है, भक्षण भी करती है,
और आनंदपूर्वक उसमें रहती है।
लेकिन हम अपने ही बनाए हुए जाल में फँसे
रहते हैं, तरह-तरह के दुःख भोगते
हैं और उसी में उलझे रहते हैं, क्योंकि हमें इस जाल की
वास्तविकता का कोई समझ नहीं है। हम झूठ को
सत्य मानकर जी रहे हैं, इसलिए हमारे जीवन में आनंद नहीं है।
निष्कर्ष : (सूत्र) तो, जीवन
का सीधा गणित है: अज्ञान → आसक्ति → दुःख (अज्ञान के कारण आसक्ति है और आसक्ति का परिणाम दुःख है)।
तो आइए, हम भी मकड़ी की तरह बुद्धिमान बनें। इस जाल से निकलने का साधन खोजें,
इसकी मिथ्या को समझें, और स्वयं की खोज की
यात्रा पर निकलें।
इस यात्रा में बोधिमित्र आपका सहायक है, गुरु-क्षेत्र का एक माध्यम है।
नमस्कार। आभार।
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